प्राचीन भारत का इतिहास: महत्वपूर्ण पारिभाषिक शब्दावली

पारिभाषिक शब्दावली एवं  उनके अर्थ  

1.जम्बूद्वीप – भारतवर्ष का सर्वाधिक प्राचीन नाम जम्बूद्वीप के नाम से जाना जाता है।

2.अघन्या – वैदिक काल में वध न की जाने वाली गाय को अघन्या कहा जाता था।

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3.अनस – वैदिक काल में बैलगाड़ी के लिए अनस शब्द प्रयुक्त होता था।

4.अदेवयु – देवताओं में श्रध्दा न रखने वाले।

5.अब्रम्हान – वेदों को न मानने वाला।

6. जन – वैदिक कबीले जन कहलाते थे।

7.ज्येष्ठक – गुप्त काल में श्रेणियों का प्रमुख ज्येष्ठक कहलाता था।

8.दास/दस्यु – आर्यों के आगमन से पूर्व यहां के मूल निवासियों को आर्यों ने दास या दस्यु कहा।

9. दुहिता– वैदिक काल में दूध दुहने वाली अर्थात पुत्री दुहिता कहलाती थी।

10.  पणि – वैदिक काल में व्यापारी को पणि कहा जाता था।

11. पत्तनम – संगम काल में तटवर्ती नगर पत्तनम कहलाते थे।

12. पुनर्भव – गुप्त काल में पुनर्विवाहित स्त्री से उत्पन्न पुत्र पुनर्भव कहलाता था।

13. पेठ – गुप्त काल में ग्रामों के समूह को पेठ कहा जाता था।

14. ब्रीही – वैदिक काल में चावल के लिए ब्रीही शब्द प्रयुक्त हुआ है।

15. बलि – वैदिक काल में स्वेच्छा से दिया जाने वाला उपहार बलि कहलाता था।

16. ब्रम्हादेय – मौर्यकाल में कर मुक्त भूमि को ब्रम्हादेय कहा जाता था।

17. भागदुध – वैदिक काल में कर संग्रहण करने वाला भागदुध कहलाता था।

18. भाग – भूमि- उत्पादन से कर के रूप में राजा को दिया जाने वाला 1/6 वां हिस्सा को (गुप्तकाल में ) भाग कहा जाता था।

19. भोग – गुप्त काल में राजा को प्रतिदिन दी जाने वाली भेंट भोग कहलाती थी।

20. महत्तर – गुप्तकाल में ग्राम सभाओं के सदस्य महत्तर कहलाते थे।

21. वार्ता – मौर्यकाल में वाणिज्य, कृषि और पशुपालन को सन्युक्त रुप से वार्ता कहा जाता था।

22. विष्टि – गुप्तकाल में बेगार के लिए प्रयुक्त शब्द विष्टि कहलाता था।

23. वास्तु भूमि – गुप्तकाल में निवास करने योग्य भूमि को वास्तु भूमि कहा जाता था।

24. सार्थवाह – गुप्त काल में व्यापारिक समूह का नेता सार्थवाह कहलाता था।

25. स्पश – वैदिक काल में गुप्तचर स्पश कहलाते थे।

26. सीता – मौर्य काल में राज्य की भूमि से होने वाली आय को सीता कहा जाता था।

27. सप्तांग – कौटिल्य के अर्थशास्त्र में सप्तांग सिध्दांत ( राज्य के सात अंग) उल्लेखित हैं, ये अंग हैं – राजा, अमात्य,  जनपद, दुर्ग, कोष, सेना और मित्र ।

28. सप्तसिंधु – आर्यों ने भारत में अपने आदि प्रदेश के लिए सप्तसिंधु शब्द का प्रयोग किया है।

29. भरत – वैदिक आर्यों की सबसे महत्वपूर्ण जनजाति भरत थी, इसके नाम पर पूरा देश भारत के नाम से प्रसिध्द हुआ।

30. विधिवत शुध्दि – संस्कार का अर्थ विधिवत शुध्दि है।

31. दण्डनीति – मौर्य कालीन कानून और व्यवस्था।

32. अग्रहार – ब्रम्हाणों को दी जाने वाली करमुक्त भूमि अग्रहार कहलाती थी।

33. पुरूषार्थ – जीवन के आधार स्तंभ यथा- धर्म, अर्थ, काम मोक्ष।

34. पुरूष सूक्त – ऋग्वेद के दसवें मंडल में वर्णित पुरूष सूक्त में विराट द्वारा चार वर्णों का उल्लेख ( ब्राम्हाण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) की उत्पत्ति का वर्णन प्राप्त होता है।

35. एतरेय ब्राम्हाण – चारो वर्णों के कर्तव्य का उल्लेख ऐतरेय ब्राम्हाण में मिलता है।

36. जाबालोपनिषद – चारो आश्रमों ( ब्रम्हचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास) का विवरण इसमें प्राप्त होता है।

37. धर्म विजय – समुद्रगुप्त की दक्षिणापथ विजय को रायचौधरी ने धर्मविजय की संज्ञा दी है।

38. स्तूप – किसी वस्तु का ढेर या धूहा

39. अलवार – दक्षिण भारत के वैष्णव संतो को अलवार कहा जाता है।

40. नयनार- दक्षिण भारत के शैव संतो को नयनार कहा जाता है।

41. आहत सिक्के – भारत की प्राचीनतम (5वीं सदी) मुद्रा आहत सिक्कों के नाम से जाना जाता है।

42. बोगजकोई – सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख मध्य एशिया के बोगजकोई नामक स्थान से प्राप्त (लगभग 1400 ई. पू.),इस अभिलेख में इंद्र, मित्र, वरूण और नासत्य आदि वैदिक देवताओं का उल्लेख मिलता है।

43. बोधिसत्व– बौध्द धर्म दर्शन महायान का आदर्श शब्द बोधिसत्व्।

44. तीर्थंकर – जैन परम्परानुसार जैन संत तीर्थंकर कहे जाते थे जिसमें प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव तथा 24वें व अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी थे।

45. अर्थशास्त्र – भारत का पहला राजनीतिक ग्रंथ जिसके लेखक कौटिल्य हैं ।

46. नागर शैली – उत्तर भारत में हिमालय से लेकर विंध्य प्रदेश के भू-भाग तक विकसित वास्तुकला की शैली ।

47. बेसर शैली – विंध्य से लेकर कृष्णा नदी के बीच (दक्षिणावृत) में विकसित वास्तुकला की शैली

48. द्रविड़ शैली – कृष्णा नदी से कुमारी अंतरीप के बीच अर्थात आधुनिक तमिलनाडु में विकसित वास्तुकला की शैली।

49.  स्त्रीधन – स्त्री की निजी सम्पति जो वह दहेज या उपहार में अपने पिता के पक्ष से प्राप्त वस्तुए,आभूषण, जवाहारात आदि ।

50. चैत्य – इसका अर्थ पवित्र कक्ष्। जिसके मध्य में एक छोटा स्तूप होता था। जिसे दागोब के नाम से भी जाना जाता था, जिसकी पूजा होती थी। उदा. – कार्ले का चैत्य्।

51. सभा व समिति – वैदिक काल में श्रेष्ठ व अभिजात्य लोगों की संस्था जो राजा को प्रशासन में परामर्श देती थी। समिति – केंद्रीय राजनैतिक संस्था जो जनता का प्रतिनिधित्व करती थी। समिति राजा की नियुक्ति, पद्च्युत करने व उस पर नियंत्रण रखती थी।

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