विदेशों में भारतीय संस्कृति और परंपरा का प्रसार

विदेशों में भारतीय संस्कृति और परंपरा का प्रसार और इसकी निरन्तरता

प्रस्तावना –

भारत के लोगों के प्राचीन काल से ही दूर दशों के साथ व्यापारिक संबंध थे। इसका प्रमाण है कि भारत की सिन्धु घाटी के लोगों तथा मिस्त्र, बेबीलोनिया, एसीरिया तथा प्रागैतिहासिक काल की अन्य सभ्यताओं जो ईसा से 3000 वर्ष पूर्व पाई जाती थीं, में सांस्कृतिक समानता पाई जाती है। टॉकाप्पि आम भी बताते हैं कि कुछ तमिल समुद्र पार करके व्यापार के लिए विदशों में गये। ये व्यापारी अपने साथ अपने परिवारों को नहीं ले गये क्योंकि समुद्री यात्रा खतरों से भरी थी। वैदिक साहित्य में भी समुद्री यात्रा का वर्णन है।

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अन्वषणों तथा खोजों से जो सर ओरेल स्टीन, डॉ. आर. सी. मजूमदार के कथन से ज्ञात होता है कि भारतीयों के अनेक विदशों से काफी माधुर्यपूर्ण संबंध थे तथा भारतीय सभ्यता का विस्तार दूर-दूर तक हुआ था। कुछ राजा-महाराजा भी अपने साम्राज्यों को पुनः प्राप्त करने के लिये विदशों में सहायता लेने के लिए गए। अनेक धर्म प्रचारकों ने भी धर्म यात्रायें कीं तथा भारत की धर्मपताका उन दशों में फहरायी तथा संस्कृति का विस्तृत प्रचार किया। कुछ समय पूर्व तक ऐसा माना जाता था कि भारतीय बाहरी भ्रमण करना पसन्द नहीं करते थे तथा उनकी सभ्यता व संस्कृति राष्ट्रीयता की सीमाओं के भीतर ही कैद रही। अल्बरूनी ने भी लिखा है कि भारतीय एकान्तवास पसंद करते थे तथा बाहरी दुनिया से अलग-थलग पड़े रहते थे। आगे उसका कहना है कि भारतीय पानी से घबराते थे तथा कभी भी समुद्री यात्रा नहीं करते थे।

भारत ने पिछले 10,000 वर्षों के इतिहास में कभी किसी देश पर हमला नहीं किया, फिर भी बाहर के देशों में भारतीय संस्कृति का एक बड़ा प्रभाव है। कई छोटी संस्कृतियाँ उभरीं, परंतु वे छोटे क्षेत्रों तक ही सीमित रहीं। भारतीय संस्कृति को प्रथम विश्व संस्कृति के रूप में जाना जा सकता है।

भारतीय संस्कृति को विदेश तक कौन ले गया?

उपलब्ध स्रोतों के अनुसार, सिंधु घाटी सभ्यता के समय से ही भारत बाहरी दुनिया के संपर्क में रहा है।

  • रोमा (बंजारे) ईरान और इराक के रास्ते तुर्की और अन्य दूरस्थ स्थानों तक पहुँच गये। वे यूरोप भी गये, जहाँ वे ‘जिप्सी’ या खानाबदोश के रूप में पहचाने जाने लगे।
  • व्यापारिक गतिविधियाँ वियतनाम, इटली और चीन के साथ आरंभ हुई। व्यापार की खोज में हमारे देश के बहुत-से लोग अन्य देशों में जाकर बस गये और हमारी समृद्ध संस्कृति की विरासत भी साथ ले गये।
  • सम्राट अशोक ने अपने बेटे और बेटी को बौद्ध धर्म का प्रसार करने के लिए श्रीलंका भेजा।
  • पहली शताब्दी ई.पू. में भारतीय व्यापारियों ने सोने की तलाश में इंडोनेशिया और कंबोडिया, जैसे देशों की यात्रा की।
  • कलिंग वंश ने श्रीलंका के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किये।
  • विभिन्न विदेशी पर्यटकों की भारत यात्रा और भिक्षुओं व धर्म प्रचारकों की विदेश यात्राओं के कारण भी भारतीय और विश्व संस्कृतियों का आदान-प्रदान हुआ।

भारत के प्रमुख प्राचीन बंदरगाह-

प्राचीन और मध्यकाल में विभिन्न देशों के साथ समुद्री व्यापार ने विदेशों में भारतीय संस्कृति के प्रसार में बड़ी भूमिका निभायी। प्राचीन भारत में बदरगाहों का विस्तृत विवरण ‘पेरिप्लस ऑफ द एरीथ्रीयन सी’ और ‘जियोग्राफिया’ जैसी पुस्तकों से प्राप्त किया जा सकता है। मौर्य शासन के दौरान, नवाध्यक्ष, अर्थात जहाज़ानी के अधीक्षक जहाजानी प्रशासन की देख-रेख करते थे। अंतिम सातवाहन राजा यज्ञ श्री सातकर्णी के सिक्कों में जहाज़ दर्शाए गये थे, संभवतः यह उस राजवंश की नौसेना की शक्ति का संकेत था। आइए, हम प्राचीन काल में प्रमुख बंदरगाहों की एक उदाहरण सूची देखें।

बंदरगाह का नाम-

लोथल –गुजरात (वर्तमान अहमदाबाद के पास)

कालखंड -सिंधु घाटी सभ्यता 2400 ईसा पूर्व – मेसोपोटेमिया तक ताँबे, हार्डवुड, हाथीदाँत, मोती, कार्नेलियन और सोने का निर्यात और सुमेरिया तक टिम्बरवुड और लाजवर्द का निर्यात।

बरिगजा – गुजरात में वर्तमान भरूच शहर

कालखंड – तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से: पश्चिमी क्षत्रपों के अंतर्गत रोमन व्यापार का प्रमुख केंद्र- अरब देशों के साथ मसाला और रेशम का व्यापार। 17वीं शताब्दी में दो बार लूटा गया, लेकिन पुनः शीघ्र तैयार हो गया। गेहूं, चावल, तिल का तेल, सूती कपड़ों का आयात।

मुजीरिस – मालाबार तट, केरल (वर्तमान में कोच्चि के पास)।

कालखंड – पहली शताब्दी ईसा पूर्व से: चेर साम्राज्य- संगम साहित्य में फारस, रोम, यूनान और मिस्र देशों को मसालों, उपरत्नों वैद्य, मोती, हीरे, नीलमणि हाथीदाँत, चीनी रेशम, एक पुष्पीय औषधीय पादप, और कछुए के खाल के निर्यात का उल्लेख मिलता है।

कोरकई- तमिलनाडु

प्रारम्भिक पांडयन साम्राज्य – मोती, मत्स्य पालन का प्रसिद्ध केंद्र, जिसका संगम साहित्य में उल्लेख मिलता है।

पुहार (कावेरी पुमपट्टिनम भी कहा जाता है)-

कालखंड – तमिलनाडु, कावेरी नदी के मुहाने पर

प्रारंभिक चोल राजवंश: 400 ईसा पूर्व – 200 ईस्वी-  विभिन्न वस्तुओं का आयात। शिलप्पादिकारम में उल्लेख मिलता है।

पोडुके – दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व – 8वीं शताब्दी ईस्वी – पुडुचेरी के नजदीक (मौजूदा अरीकमेडू)- रोम के साथ व्यापार करने के लिए यूनानी व्यापार बंदरगाह। निर्यात के सामान में जवाहिर, मोती, मसाले और रेशम सम्मिलित हैं। शराब का आयात प्रचलित था।

बर्बरिकों-

पार्थियन्स और सिथियन , कराची, पाकिस्तान के पास- लिनेन, पुखराज, मूंगा, पेटी, लोबान, काँच के सामान, चाँदी और सोने की प्लेट और शराब का आयात। निर्यात में फ़िरोज़ा, लाजवर्द, रेशमी, सूती कपड़े, रेशम यार्न और नील सम्मिलित हैं।

सोनगरा – वारी वर्तमान बांग्लादेश में बैतेश्वर

कालखंड –  450-300 ईसा पूर्व; मौर्य राजवंश- भूगोलज्ञ टॉलेमी की पुस्तक जियोग्राफिया में उल्लिखित।

मछलीपट्टनम, आंध्र प्रदेश, मैसोलिया या मसूलीपट्नम

कालखंड- सातवाहन के शासनकाल के दौरान तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से।

प्राचीन यूनानियों द्वारा मस्लिन (Muslin) कपड़े का कारोबार किया जाता था। 15वीं से 17वीं शताब्दियों तक गोलकुंडा राज्य का प्रमुख समुद्री बंदरगाह।

ताम्रलिप्ति

कालखंड- मौर्य राजवंश, वर्तमान में तामलुक, पश्चिम बंगाल – दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए मौर्य व्यापार मार्ग का निकास बिंदु। आरती शताब्दी के उदयमान के दुधपानी चट्टान शिलालेख में प्राचीन दक्षिण एशिया के एक बंदरगाह के रूप में ताम्रलिप्ति का अंतिम रिकॉर्ड है। यूनानी भूगोलज्ञ टॉलेमी ने अपनी पुस्तक जियोग्राफिया में ताम्रलिप्ति के बारे में बताया। चीनी तीर्थयात्री स्वेन-त्यांगने शहर को तान-मो-लिह-ती कहा। 639 ई. में हवेन-त्सांग द्वारा यहाँ का दौरा किया गया था। फाह्यान दो साल के लिए यहाँ ठहरे थे।

पलूर- ओडिशा का गंजम ज़िला

कालखंड – दूसरी शताब्दी ई; कलिंग राजवंश-

दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के लिए यात्रा की शुरूआत करने वाला बंदरगाह। टॉलेमी और हवेन त्सांग द्वारा इसका उल्लेख क्रमशः दूसरी और सातवीं शताब्दी ई. में किया गया था।

 

प्राचीन काल में भारत के बाहरी संपर्क का संक्षिप्त इतिहास :

भारत ने विभिन्न देशों में अपने देश की सभ्यता व संस्कृति का प्रचार व प्रसार किया था। अनेक देशों में भारतीय बस्तियों भी बसायी गई थीं। इस प्रकार की अधिकांश बस्तियां दक्षिण-पूर्व में हिन्द-चीन के इलाकों (इसमें सामान्यतः वियतनाम, लाओस व कम्बोडिया को सम्मिलित किया जाता है) तथा जावा, सुमात्रा, बोर्नियो तथा बाली के दीष समूहों में बसायी गयी थी। इन इलाकों में अत्यंत आदिम प्रकार की जातियां निवास करती थीं तथा ये असभ्य मानी जाती थीं। लेकिन ये क्षेत्र खनिज व मसालों के मामले में काफी सम्पन्न थे। जातक तथा कथासरित सागर व अन्य साहित्यिक कृतियों में हवं अनेक कथानक प्राप्त होते हैं, जिनसे हमें भारतीय व्यापारियों के स्वर्णभूमि पर पदार्पण के प्रमाण मिलते हैं। दक्षिण पूर्व के इन तमाम राष्ट्रों को स्वर्णभूमि के रूप में देखा जाता रहा है। उद्यमियों का इस क्षेत्र में अपना व्यापार करना अत्यंत लाभप्रद व्यवसाय माना जाता था, लेकिन इन क्षेत्रों की यात्रा करना अत्यंत दुस्साहसिक कार्य माना जाता था। इसलिये कुछ साहसिक नाविकों तथा व्यवसायियों ने इन क्षेत्रों का भ्रमण किया तथा आगे चलकर कुछ महत्वाकांक्षी भ्रमणकारियों ने यहां स्वतंत्र रूप से अपनी सत्ता स्थापित की थी। साथ ही साथ उनके द्वारा लाई गई सभ्यता व संस्कृति ने भी इन भू-भागों में अपने पैर पसारने प्रारम्भ कर दिए थे। इस रूप में इनको भारतीय बस्तियों के रूप में निरूपित किया जाने लगा था। इस प्रकार की कुछ भारतीय बस्तियां दूसरी शताब्दी से लेकर पांचवीं शताब्दी तक अस्तिव में आती रहीं, जिनमें महत्वपूर्ण थीं-मलाया प्रायद्वीप, कम्बोडिया, अन्नाम, सुमात्रा, जावा, बाली तथा बोर्नियो ।

इन राज्यों का सामान्य धर्म था-शैव मत लेकिन बौद्ध धर्म की महायान शाखा का धार्मिक प्रचार भी काफी विस्तृत आयाम ग्रहण कर चुका था। इस धर्म को भी वहां के निवासियों ने अपने धर्म के रूप में स्वीकार कर लिया था। स्थानीय निवासियों ने भी भारतीय सभ्यता व सस्कृति को अपनी मातृ संस्कृति के रूप में स्वीकार कर लिया था। हिन्दू धर्म के स्थानीय निवासियों के संपर्क में आने के कारण इस सनातन धर्म में भी अनेक बदलाव आने प्रारम्भ हो चुके थे। इस प्रकार एक सर्वथा नये प्रकार की संस्कृति ने आकार ग्रहण करना प्रारम्भ कर दिया था जो उक्त दोनों संस्कृतियों का परिणामगत प्रतिफल था। यद्यपि प्रथम एक हजार वर्षों कालखण्ड में इस क्षेत्र में भारतीय संस्कृति का प्रभाव अक्षुण्य बना रहा था, लेकिन भारतीयों ने विदेशी भूमि के उन हिस्सों पर बस्तियाँ बनाने के कार्य को अधिक प्राथमिकता दी जो भारतवर्ष के अधिक निकट थीं। इसी का परिणाम था कि जो बस्तियाँ शीघ्र अस्तिव में आयीं उनमें बर्मा, स्याम, लंका तथा हिन्द-चीन के भू-भाग सम्मिलित थे। इन बस्तियों का यहाँ विवरण प्रस्तुत करना उचित रहेगा।

बर्मा (Burma)- प्राचीन इतिहास में भारत व बर्मा के संबंधों का उल्लेख नहीं मिलता है। कलिंग के वासियों ने बर्मा के लोगों से कुछ संबंध स्थापित करने में सफलता प्राप्त की थी। लेकिन अशोक के शासन काल में बर्मा में बौद्ध धर्म का प्रचार तेजी से हुआ तथा भारत की सांस्कृतिक विरासत का बर्मा पर प्रभाव पड़ना प्रारम्भ हुआ। ग्यारहवीं शताब्दी ई. सन् तक भारत व बर्मा के मध्य किसी न किसी रूप में संबंध बने रहे। उसी काल खण्ड में चोल वंश के सम्राट राजेन्द्र प्रथम ने बर्मा की समुद्री यात्रा की तथा उसको अपने साम्राज्य का अंग बनाने में सफलता प्राप्त की। इससे बर्मा में भारतीय संस्कृति, कता तथा दर्शन का गहरा व दरगामी प्रभाव पड़ा। गुप्त काल के समय के कछ बौद्ध हिन्दू अवशेष धाटुन, पेगु तथा प्रोमा में प्राप्त किए गए हैं। निचले बर्मा में एक लिपि में लिखे लेख प्राप्त हुए हैं जिसकी साम्यता कन्नड़-तेलगू लिपि से प्रकट होती है। * सिविकरण का प्रमाण वहाँ के राजाओं के नामों व उपाधियों से भी प्राप्त होता है, हरितीने भारतीय नाम की उपाधियाँ तथा विक्रम व वर्मन को धारण किया।

स्याम (Siam)-तृतीय शताब्दी ई सन् में स्याम भारत का उपनिवश वना तथा समय के साथ-साथ पूर्ण रूप से भारतीयता के परिवश में रंग गया। कुछ समय पश्चात् एक हुन्य उपनिवश कम्बोडिया से बौद्ध धर्म की शाखा महायान की पहुँच स्याम देश तक हूं। उनकी लिपि भी पाली लिपि से साम्य रखती है। अधिकांश धार्मिक अनुष्ठान व हस्कार जो हिन्दुओं के थे, को यहाँ के निवासियों ने सहर्ष अंगीकार कर लिया। अनेक तीज-त्यौहार तथा दशहरा आदि वे भी धूमधाम से मनाने लगे।

स्याम के साहित्य में अनेक उपाख्यानों का समावश दिखाई देता है जो प्रसिद्ध हिन्दू महाकाव्यों रामायण तथा महाभारत से उद्धृत हैं। आज भी स्याम देश के राजकुमार के राजतिलक समारोह का विधि-विधान किसी ब्राह्मण पण्डित के हाथों से ही सम्पन्न कराया जाता है।

विदेशों में भारतीय संस्कृति का देशवार प्रभाव –

पूर्व पर सांस्कृतिक प्रभाव –

  1. हिन्द चीन- चीन

रेशम मार्ग एक प्रमुख व्यापार मार्ग था, जिसने बौद्ध धर्म को भारत से सुदूर पूर्व तक फैलाने में भी मदद की। मैसूर में पाया गया चीनी सिक्का, जो 138 ईसा पूर्व का है। बौद्ध धर्मावलम्बियों के भारत से बाहर जाने से पहले समुद्री संबंधों के अस्तित्व को इंगित करता है।

चम्पा (Champa)– चम्पा की कॉलोनी, जो हिन्द चीन की मुख्य भूमि पर स्थित है की स्थापना दूसरी शताब्दी में हुई। यह कॉलोनी महत्त्वपूर्ण थी क्योंकि यह भारत और चीन के बीच व्यापारिक एवम् सांस्कृतिक सम्बन्धों को जोड़ती थी। चम्पा का पहला प्रमुख शासक धर्म महाराज श्री भद्रावर्मा था। वह शिव का भक्त था और उसने मैसोन पर एक शिव मन्दिर का निर्माण किया था। मन्दिर में शिवलिंग को भद्रश्वर कहते थे। चम्पा के शासक भारत से घनिष्ठ सम्बन्ध रखते थे और इसके एक शासक ने अपना सिंहासन छोड़कर भारत की यात्रा की। भारत की पद्याति से राजा को देवी शक्ति प्रदान होती है, चम्पा में पालन की जाती थी। यह हिन्दू साम्राज्य लगभग तीन शताब्दियों तक फला-फूला, जब तक मंगोलों ने इसे तहसनहस न कर दिया। इस साम्राज्य में भारतीय संस्कृति की गहन छाप थी। यहाँ के चोल पूरी तरह हिन्दू संस्कृति के अनुयायी थे। वे हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा करते थे जैसे शिव, शक्ति, गणश, स्कन्द, विष्णु, कृष्ण, बुद्ध आादि। कला के क्षेत्र में ये लोग गुप्त काल की कला की तकनीक का पालन करते थे। संस्कृत में अनेक लेख मिले हैं जिससे प्रकट होता है कि यह एक बहुत ही प्रचलित भाषा थी। शायद यही सरकारी भाषा थी।

काम्बोज देश का कम्बोडिया (Kambuja (Funan) or Cambodia)

खमेर लोगों की संस्थापक किंवदंती भारतीय ब्राह्मण कौंडिन्य ऋषि के इर्द-गिर्द है, जो स्थानीय नागा राजकुमारियों से शादी करते हैं और इस प्रकार पहले कंबोडियाई शाही राजवंश की स्थापना करते हैं।

चंपा और कंबुज के प्रसिद्ध राज्य पर भारतीय मूल के हिंदू राजाओं का शासन था। कंबोडिया में भारत का प्रभाव अंगकोरवाट (विष्णु का निवास स्थल) के मंदिरों से लेकर लिखित

खमेर तक दिखाई देता है, जो वर्तमान दक्षिण भारत की पल्लव लिपि से आता है। हिन्द-चीन क्षेत्र में काम्बोज एक अन्य राज्य था जहाँ भारतीयों ने अपना विस्तार किया। इस राज्य में अस्तिव में आने की ठीक से जानकारी उपलब्ध नहीं है। एक पुरानी कथा के अनुसार कम्बुज वंश की स्थापना कौण्डिन्या नामक ब्राह्मण के द्वारा की गई थी, जिसने नागा राजकुमारी से विवाह किया था। एक अन्य कथा के अनुसार वह इन्द्रप्रस्थ के प आदित्यवर्मा का पुत्र था। लेकिन इतना निश्चयात्मक रूप से कहा जा सकता है कि एक हिन्दू था। इस राज्य को आगे चलकर कम्बोडिया नाम से पुकारा जाने लगा। आरती शताब्दी में यह भारत का एक शक्तिशाली उपनिवेश था। जीव वर्मन प्रथम, जीव वर्ष द्वितीय, यशोवर्मन तथा सूर्यवर्मन यहाँ के अत्यंत प्रतापी शासक थे, जिन्होंने इस क्षेत्री प्रतिष्ठा को चार चाँद लगाए थे। कम्बोडिया के वंश को तेरहवीं शताब्दी में पतनक मुख देखना पड़ा, जब अन्नामी लोगों ने इसको रौंद डाला। बाद के काल में इस फ्रांसीसी सेना का आधिपत्य स्थापित हो गया।

शैव मत इस राज्य का सर्वाधिक लोकप्रिय धर्म था । वैष्णव व बौद्ध मतों का असर भी वहाँ के लोगों पर था। कम्बोडिया के लोग गंगा तथा सरस्वती जैसी नदियों की भूजा अर्चना किया करते थे। संस्कृत यहाँ की राजकीय भाषा घोषित की गई थी। संत मात में लिखी गई गायन शैली में अनेक कवितायें यहाँ के उत्खनन से प्राप्त हई हैं। रामायण महाभारत तथा प्राणों का अध्ययन यहाँ के लोग मनन पूर्वक किया करते थे। भारतीय चिकित्सा पद्धति यहाँ पर अत्यंत लोकप्रिय हो चुकी थी। सम्राट रूद्रवर्मन ने अपने दरवा में भारतीय वैद्य की नियुक्ति कर रखी थी। कम्बुज लोगों ने न केवल भारतीय धर्म अंगीकार किया अपितु सभ्यता, संस्कृति, राजनीतिक व्यवहार, सामाजिक विचारधारा तया रीति-रिवाजों को भी अपने जीवन में यथासंभव उतारा, सर्वाधिक उत्कृष्ट नमूना भारतीय परंपरा का उस क्षेत्र में अंकोरवाट का मंदिर है, यह पूर्ण रूप से एक शिव मंदिर है जो शैव मत को समर्पित है। महाराजा सूर्यवर्मन के द्वारा इस का निर्माण कराया गया था। मानव द्वारा निर्मित यह सर्वाधिक विशाल मंदिर है तथा संसार के आश्चयों में से एक माना जाता है।

मलाया द्वीप समूह (Malaya Archipelago)-अनेक भारतीय बस्तियों का निर्माण मलाया द्वीप समूह के क्षेत्रों में किया गया था। इस बात के प्रमाण वहाँ पाये गये अनेक अवशषों में प्राप्त होते हैं। प्रथम हिन्दू राजवंश की स्थापना इस क्षेत्र में चौदी शताब्दी में शैलेन्द्र वंश के द्वारा की गई थी। इसका विस्तार मलाया प्रायद्वीप से लेका सुमात्रा, जावा, बाली तथा बोर्नियों के द्वीपों तक विस्तीर्ण था। ऐसा भी माना जाता है कि इससे काफी पूर्व में भी वहां पर हिन्दू बस्तियाँ मौजूद थीं। लेकिन उनके संबंध में कुछ भी ज्ञात नहीं है। शैलेन्द्र राजवंश का शासन ग्यारहवीं शताब्दी तक कायम रहा था। इसके पश्चात् दक्षिण भारत के प्रतापी सम्राट राजेन्द्र चोल ने उक्त राज्य के एक बड़े भू-भाग को विजित कर अपने क्षेत्र में मिला लिया था। इतने सुदूर क्षेत्रों पर शासन व्यवस्था कायम रखना राजेन्द्र चोल व उसके उत्तराधिकारियों के लिए संभव न था। अतः अगली शताब्दी में शैलेन्द्र राज परिवार ने सफलतापूर्वक अपने खोए राज्य को पुनः प्राप्त कर लिया था। ऐसा किए जाने के पश्चात् भी शैलेन्द्र राज घराने का प्रभाव अक्षुण्य न रह सका, तथा चौदहवीं शताब्दी में उनका शासन अस्ताचल की ओर चला गया तब जावा के नये राज्याधिकारी ने इस हिन्दू राज्य का शासन अपने हाथों में ले लिया था। शैलेन्द्र राज परिवार के शासक बौद्ध धर्म की महायान शाखा के अनुयायी थे। उन्होंने अपने राज्य के क्षेत्रों में अनेक मठों तथा विहारों का निर्माण कराया था। सर्वाधिक विख्यात मठ नालन्दा में तथा महत्वपूर्ण विहार नागपट्टनम में स्थित है। शैलेन्द्र वंशीय शासकों ने कलात्मक कार्यों को भी महत्वपूर्ण संरक्षण प्रदान किया तथा विख्यात-इमारतें तथा ‘चाँदी कलशम’ तथा ‘बड़ा बुदुर’ जावा में निर्मित कराए थे। बड़ा बुदुर अपनी शानदार कलात्मकता के लिए जाना जाता था। इसका निर्माण 750 से 850 ई सन् के मध्य जावा की पहाड़ियों के केन्द्र में किया गया था। यह नौ विशाल पत्थरों से बनाया गया था जो एक निश्चित ऊँचाई व व्यास के साथ एक-दूसरे के ऊपर रखे गये थे। बीच बाला गुम्बद घण्टी से सजाया गया था। जिसका आकार स्तूप के आकार का भ्रम पैदा करता था। इसमें ध्यानमग्न बुद्ध की अनेक प्रतिमाएँ गुप्त वंश की प्रतिमाओं के समान प्रतीत होती थीं, जिससे ज्ञात होता है कि जावा की कला का प्रेरणा स्रोत निश्चित रूप से गुप्त कालीन कला रही होगी।

जावा (Java)-ईसा की प्रथम शताब्दी में जावा में भारतीयों ने हिन्दू बस्तियों को बसाना प्रारम्भ कर दिया था। मुख्य रूप से ये भारतीय कलिंग प्रान्त से गए थे। दूसरी शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में देववर्मन नामक राजा ने यहाँ अत्यंत शक्तिशाली हिन्दू साम्राज्य की बस्तियों का निर्माण कर लिया था। इस वंश का शासन लगातार पाँचवीं शताब्दी तक अक्षुण्य बना रहा था। एक अन्य साम्राज्य का उदय मध्य जावा में हुआ, जो हिन्दू राज्य था। इस साम्राज्य की स्थापना संजय नामक युवराज ने की थी तथा राजधानी के नाम पर इस साम्राज्य का नाम मातरम् पड़ा था लेकिन शीघ्र ही जावा साम्राज्य का आधिपत्य शैलेन्द्र राज परिवार के हाथों में आ गया तथा यह स्थिति नवीं शताब्दी के अन्त तक बनी रही थी। इसके पश्चात् जावा एक बार पुनः शैलेन्द्र परिवार की अधीनता से मुक्त हो गया तथा स्वतंत्र अस्तिव कायम कर लिया था। कालान्तर में अनेक शक्तिशाली हिन्दू राज्यों का उदय तथा पतन होता रहा। उदय व पतन की ये प्रक्रियाएँ अधिकांशतः पूर्वी जावा की नियति बन चुकी थी। इनमें ख्यातिप्राप्त साम्राज्य थे-कदिरी, सिंहसरी, मजपहित तथा मलक्का इस्लाम के आक्रान्तक रुख के कारण जावा के हिन्दू सम्राट को बाली के टापू में शरण लेनी पड़ी थी तथा जावा का हिन्दू साम्राज्य मुस्लिम साम्राज्य का अंग घोषित कर दिया गया था।

भारतीय कला तथा साहित्य का जावा के कला के साहित्य पर गहरा प्रभाव पड़ा था। जावा में अनेक जीर्ण-शीर्ण मंदिरों के अवशष प्राप्त हुए हैं, जो भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं। ‘लारा-जोंगरांग’ का मंदिर जो मध्य जावा में अवस्थित था, भारतीय कला शैली का उत्कृष्ट नमूना था। मंदिर की प्राचीरों पर राम तथा कृष्ण से संबंधित अनेक आख्यान उकेरे गये थे। अनेक शिल्प कलाओं तथा मूर्तियों में भारतीय परंपराओं की झलक स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त होती थी। जावा की अनेक दशज परंपराओं में भारतीय महाकाव्य रामायण तथा महाभारत का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता था। भारतीयता के विस्तृत  प्रभाव के कारण ही उपनिषदों की विस्तृत दार्शनिकता की झलक जावा के साहित्य में दृष्टिगोचर होती है। कालान्तर में शक्ति की पूजा तथा तांत्रिक क्रियाओं के आविर्भात के दृष्टांतों में भी भारतीय प्रभाव परिलक्षित होता था । द्विदेव शिव व विष्णु का स्वरूप भी जावा के जन-जीवन में देखने में आता था। जावा के साहित्यिक क्षेत्र में भी गय पद्य दोनों विधाएँ हिन्दू विचारधारा से ओतप्रोत थीं। जावा के सम्राटों के नाम भारतीय हिन्दुओं व बौद्धों के नाम के समान रखे जाते थे। राज दरबारों के रीति-रिवाजों पर की भारतीयता की छाप स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती थी।

भारत-बाली संबंध (Bali)-

पुरातन काल में बाली भी भारतीय बस्तियों में महत्वपूर्ण स्थान रखती थी। जब इस्लाम के साम्राज्य विस्तार के कारण मलया द्वीप श्रृंखला की अनेक हिल्य बस्तियाँ तथा राज्य सिमटते जा रहे थे, उस काल में बाली टापू हिन्दू राजाओं की शरण स्थली बनता जा रहा था। इस क्षेत्र में हिन्दू संस्कृति अपना अस्तिव अक्षुण्य बनाए रखने में पूर्ण समर्थ थी। आज यह बता पाना कठिन है कि वास्तव में बाली क्षेत्र कब भारतीय उपनिवश बना था। लेकिन इतना निश्चयात्मक रूप से कहा जा सकता है कि छठी शताब्दी में यह भारतीय सम्राटों के अधीन एक हिन्दू बस्ती था। दसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में बाली पर जावा का आधिपत्य स्थापित हो गया था लेकिन तेरहवीं शताब्दी में बाली ने एक बार पुनः स्वाधीनता प्राप्त कर ली थी। सन् 1839 ई. को हॉलैण्ड ने इस क्षेत्र पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था तथा सन् 1911 ई. में इसको हॉलैण्ड के साम्राज्य के अंग के रूप में पराधीनता में जकड़ दिया गया था। इसके साथ ही हिन्दू सम्राटों का शासन इस क्षेत्र से समाप्त हो गया था। बाली में आज भी हिन्दू सभ्यता व संस्कृति जीवित है तथा सुदूर पूर्व में ब्राह्मण धर्म व हिन्दू संस्कृति की अंतिम शरणस्थली के रूप में बाली को जाना जाता है।

भारत- बोर्नियो संबंध  (Borneo)-बोर्नियो भारतीय बस्ती के रूप में प्रथम शताब्दी में अस्तिव में आया था लेकिन पूर्ण रूप से इस पर हिन्दू शासन चौथी शताब्दी में ही स्थापित हो पाया था। हिन्दू शासन का यह स्वरूप लगातार बना रहा था, केवल बारहवीं शताब्दी में व्यवधान पैदा हुआ था जब जावा के शासकों ने इस क्षेत्र की स्वतंत्रता का हनन किया था। उत्खनन कार्य में अनेक महत्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हुए हैं जो यहाँ भारतीय उपनिवेशवाद तथा भारतीय सांस्कृतिक श्रेष्ठता का अकाट्य प्रमाण हैं। अनेक मूर्तियां प्राप्त की गई हैं जिनमें विष्णु तथा शिव जैसे देवताओं की मूर्तियों की बाहुल्यता है। इस उत्खनन में एक काष्ट का मंदिर भी प्राप्त हुआ है। बोर्नियों की वास्तुकला में उस क्षेत्र के प्राकृतिक तव विद्यमान दिखलाई पड़ते हैं तथापि भारतीय कला पक्ष की छाप भी स्पष्ट रूप से यत्र-तत्र बिखरी दिखलाई पड़ती है।

भारत -फिलीपिन्स सबंध (Phillipines)-आधुनिक विद्वानों का अभिमत है कि भारतीयों ने फिलीपीन्स टापुओं पर भी अपने उपनिवश स्थापित किए थे। फिलीपीन्स के लोगों पर दक्षिण भारत की संस्कृति व रीतिरिवाजों का असर पड़ा था। हस्तकला, सिक्के, लोकनृच तथा धर्म पर साफ तौर पर हिन्दू धर्म का प्रभूत्व दिखाई देता है। गणेश की मूर्ति का मिलना इस बात का स्पष्ट प्रमाण माना जा रहा है कि फिलीपीन्स में ब्राह्मण धर्म का अस्तिव था। लोजोन नामक पहाड़ी आदिवासी जाति आज भी प्रारम्भिक वैदिक काल के देवी देवताओं की पूजा व उपासना करती हैं।

 

इन सब बातों से ज्ञात होता है कि प्राचीन भारत के लोग न केवल सुदूर दशों में जाकर भारतीय धर्मों का प्रचार करते रहे हैं अपितु भारतीय उपनिवश बनाकर भी संस्कृति की अमिट छाप वहां के निवासियों पर छोड़ी यदि हम स्मरण रख सकें कि भारतीय सभ्यता व संस्कृति ने एक उच्च आयाम का स्पर्श किया है पश्चिमी, मध्य व पूर्वी एशिया को इससे आप्लावित करके, तो हम भारत की उस महान भूमिका को पूर्णतः समझ लेंगे जिसे कभी-कभी समझने में कम करके आंका जाता है। भारतीयों द्वारा उपनिवेश व सांस्कृतिक फैलाव एक अविस्मरणीय अध्याय है, भारतीय पुरातन इतिहास का जिसे प्रायः ही भुला दिया जाता है, जिसे प्रत्येक संस्कृति प्रेमी भारतीय याद कर गर्व से गौरवान्वित्ता का बोध कर सकता है।

है। डॉ. आर. सी. मजूमदार के शब्दों में, “भारतीयों द्वारा विदेशी धरती पर उपनिवेश स्थापित करना उन लोगों के मत को नकार देते हैं जो यह मानते थे कि हिन्दू धर्म को अन्य धर्म वाले स्वीकार नहीं कर सकते । इस धर्म ने साबित कर दिया कि यह विदेशी सभ्यता को आत्मसात कर सकता है तथा आदिम जातियों के उत्थान के लिए भी इसके भीतर शक्ति व स्फूर्ति कायम हैं।”

भारत ने ईरान के साथ सर्वप्रथम छठी शताब्दी ईसा पूर्व में राजनीतिक संबंध बनाए थे। यूनान के साथ इन संबंधों की शुरूआत तीसरी शताब्दी ई. पू. में की गयी। इनके द्वारा तीनों दशों के मध्य सांस्कृतिक गतिविधियों का आदान-प्रदान प्रारम्भ हो गया। यूनान तथा ईरान के रीतिरिवाजों से आभास मिलता है कि भारतीय ब्राह्मणों ने ईरान, एशिया व अलेक्जेन्डिया को अपना निवास स्थान बनाया था। विद्वानों के मत हैं कि थेल्स आफ मिलेटस (640-546 ई. पू.), एनाक्सीमन्डर ऑफ इण्डिया (610-546 ई. पू.), क्लिटस (530-460 ई. पू.), एम्पीडोक्लीज (490 से 430 ई. पू.) तथा जेनोफेनस । अति सरिक विकारों के धारणा वेदों, होती गई है। इसी प्रकार पाइथागोरस के प्रयोग व सिद्धांत भी भारतीयांख्य दर्शन अनुद्याणित रहे हैं। सुकरात (469-399 ई. पू.) के संबंध में कहा जाता है कि वह ऐथेन्स में प्रसार सिद्धांत वैदिक साहित्य की रचनाओं से साम्यता रखते हैं। ‘गन्धर्व नगर’ की परिकल्पना में अनेक दार्शनिक प्रश्नों व अवधारणाओं के संबंध में ब्राह्मणों से विचार-विमर ऐवेन्स Abroad) में भी समाज की अवधारणा का स्वरूप भी उसने भारतीय जाति प्रथा से उधार लिया था। करता था। प्लेटो भी अपने अध्ययन के काल में भारतीयों के संपर्क में आया था तथा भारतीय संस्कृति से सर्वाधिक प्रभावित हुआ था। उसके द्वारा दी गयी अनेक उपमाएँ तथा भारतीय विज्ञानों यथा-अंकगणित, बीजगणित, रेखागणित, दर्शन, शरीर रचनाशास्त्र, स्वास्थ्य विज्ञान आदि ने भी पश्चिमी दशों पर गहरा प्रभाव डाला है। विलङ्करेण्ट ने ठीक ही कहा है, “हमारा भारत संस्कृति की मातृभूमि है, यूरोपीय भाषाओं की जननी है। वह हमारे गणित की पूर्वज है तथा ईसाईयत में व्यक्त विचार बुद्ध के विचारों से अनुप्राणित है. जिनकी जननी भारत ही है। भारत माता अनेकानेक रूपों में हम सब की माँ है।” भारतीय संस्कृति का विभिन्न दशों में प्रचार व प्रसार हुआ, लेकिन ऐसा बल प्रयोग जारा नहीं किया गया। भारत की दिग्विजय या विश्व विजय वास्तव में सत्य व न्याय को विजय हुआ करती थी। वे लोग जो भारत की संस्कृति का प्रचार करने सुदूर दशों विस्तार दूर-दूर का भ्रमण करते थे, आध्यात्मिक भावों से ओतप्रोत होते थे। वे सब के भले के लिए कार्य करते थे तथा सबके उत्थान की अभिलाषा करते थे। वे सबके लिए मुक्ति की कामना व इच्छा से अनुप्राणित रहते थे। विदशों में बस गये भारतीय व्यापारियों, व्यवसायियों, धर्म प्रचारकों तथा पर्यटकों ने वहां जाकर भारतीय संस्कार पद्धति को उनके लिए सुलभ इनाया तथा वे लोग भारतीय साहित्य व कला से परिचित हुए। कुछ समय के अन्तराल में इन लोगों ने वहाँ के बाशिन्दों से विवाह संबंध भी स्थापित कर लिए तथा उन्हें पूर्ण रूप से भारतीय करण से आप्लावित कर दिया। यह आप्लावन की क्रिया तीसरी शताब्दी ई.पू. में प्रारम्भ हुई थी तथा लगातार तेरहवीं शताब्दी ई. सन् तक जारी रही। अतः डॉ. आर. सी. मजूमदार के इस दावे से असहमत होने का कोई कारण नहीं है कि भारतीयों ने कभी भी एकान्त वासी जीवन व्यतीत नहीं किया तथा वे कभी भी पूरी तरह से दुनिया के अन्य दशों से अलग-थलग नहीं रहे।

यहाँ उन दशों का अध्ययन करना उचित होगा जहाँ भारतीय सभ्यता व संस्कृति प्रसार हुआ।

लंका (Cyclon)- परंपराओं के अनुसार राम प्रथम व्यक्ति थे जो भारतीय संस्कृति की विशिष्टताओं को लंका तक ले गए लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार भारत का सर्वप्रथम संपर्क लंका के साथ छठी शताब्दी ई. पू. में हुआ था। लंका की काल गणना के अनुसार बंगाल के राजा विजय ने ईसा के जन्म से लगभग 500 वर्ष पर्व लंका को विजित किया था तथा अपना उपनिवश बनाया था। उसने स्थानीय बिहारों राजकुमारी से विवाह किया तथा क्षेत्र का नाम सिंहल रखा। हालांकि इस विचार से अन्य इतिहासकार सहमति नहीं रखते हैं। उनके मत के अनुसार द्वितीय शताब्दी ई. पू. में सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संघमित्रा को धर्मप्रचारक के रूप में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए लंका भेजा था। वहां उन्होंने अपने कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न खिते थे किया तथा वहां के शासक देवनामप्रिय तिस्सा को बौद्ध धर्म में प्रणीत किया। उसके पश्चात लम्बे समय तक भारतीय संस्कृति का प्रभाव क्षेत्र में बना रहा। आगे चलकर हिन्दू धर्म व संस्कृति ने भी लंका में प्रसार पाया तथा वहां धर्म, साहित्य, दर्शन व कला पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।

अफगानिस्तान तथा मध्य एशिया (Afghanistan and Central Asia)-मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त के शासन काल में अफगानिस्तान व मध्य एशिया भारत के संपर्क में आए। चन्द्रगुप्त का साम्राज्य हिन्दुकुश पर्वत मालाओं तक विस्तारित था। उसके पौत्र सम्राट अशोक के समय में अधिसंख्य बौद्ध भिक्षु व भिक्षुणियाँ बुद्ध की शिक्षाओं को प्रसारित करने के लिये इन क्षेत्रों में भेजे गए। भारतीय बैक्ट्रीयन, शक, पार्शियन तथा कुषाणों के शासन काल में मध्य एशिया के साथ भारत का संबंध प्रगाढ़ हुआ तथा भारतीय सभ्यता का प्रकाश-पुंज कैस्पियन सागर के किनारे टर्की तक तथा चीन की दीवार को पार कर मंगोलिया तक पहुँचा। बैक्ट्रीया को भारतीय सभ्यता का विशाल केन्द्र निरूपित किया जाता था तथा आक्सस नदी को बौद्ध व ब्राह्मणों की नदी के रूप में जाना जाता था, क्योंकि अनेक बौद्ध भिक्षु तथा ब्राह्मण साधु-सन्यासी उन क्षेत्रों के निवासी बन चुके थे। बौद्ध धर्म के अन्य प्रसिद्ध केन्द्र थे-खोतान, यारकन्द, कूची इत्यादि । प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग जब वापसी में मध्य एशिया से होकर गुजर रहा था (सातवीं शताब्दी ई.सन्) तो उसने पाया कि भारतीय सभ्यता व बौद्ध विचारधारा अक्षुण्य रूप से उस क्षेत्र में प्रवाहमान थी।

जहां तक अफगानिस्तान का संबंध है, वह प्राचीन काल से भारत का अंग रहा हैं। मौर्य तथा कुषाण वंश के साम्राज्य के अन्तर्गत अफगानिस्तान की भूमि भी सम्मिलित थी। अफगानिस्तान पर सदैव ही भारतीय संस्कृति का प्रभाव रहा। अफगानिस्तान में अनेक बौद्ध मठों की प्राप्ति हुई है जो अपने समय में विद्या के केन्द्र हुआ करते थे। इन मठों का उस क्षेत्र के वासियों पर गहरा प्रभाव रहा। प्रसिद्ध यूनानी-बौद्ध अथवा गान्धारी कला इसी क्षेत्र में पनपी तथा अनेक स्तूप, मूर्तियाँ, पेन्टिंग, सिक्के तथा अन्य साहित्यिक कृतियाँ अफगानिस्तान की धरोहर बनी, लेकिन बाद के वर्षों में हिन्दु धर्म का प्रभाव बढ़ता गया। यह प्रभाव मुख्यतः काबुल घाटी के समीप के क्षेत्रों में अधिक विस्तृत रूप में परिव्याप्त था।

नेपाल (Nepal)- अशोक के समय में नेपाल बौद्ध धर्म के प्रभाव में आया। अशोक ने इस क्षेत्र को अपने प्रभाव में किया तथा अपनी पुत्री चारूमति व दामाद देवपाल के साथ इस राज्य की यात्रा भी की। अपनी यात्रा के समय उसने यहां अनेक स्तूप तथा उसने स्थानीय बहारों का निमाण करवाया। भारत पर मुस्लिमों के आक्रमण के समय अनेक ब्राह्मणों तथा राजपूतों ने इस राज्य में शरण प्राप्त की। वहाँ से वे भारतीय संस्कृति, धर्म व साहित्य तथा कला का को अपने साथ ले गए। हिन्दू धर्म इस समय राज्य का प्रमुख धर्म बन गया। अनेक मंदिरों का निर्माण इस क्षेत्र में किया गया जो अनेक बातों में भारतीय परिवश से साम्यता संपन्नते थे। हिन्दू जाति प्रथा का प्रभाव भी यहां के सामाजिक ढाँचे पर पड़ा। इसमें कोई संशय नहीं है कि नेपाल में भारतीय संस्कृति का गहरा प्रभाव पड़ा लेकिन साथ ही साथ चीनी तथा तिब्बती सभ्यता का प्रभाव भी नेपाल के जन-जीवन पर दिखाई देता है।

तिब्बत (Tibet)- तिब्बत में सभ्यता की किरण पहुँचाने वाला भारत प्रथम देश था। सातवीं शताब्दी ई सन् तक तिब्बत ने सभ्यता की किरणों का प्रकाश नहीं देखा था। साही सभ्यता के काल में तिब्बत भारत के काफी करीब रहा। नालन्दा तथा विक्रमशिला वविद्यालयों के कारण वहां के लोग इनमें अध्ययन के निमित्त आते रहते थे। इसी । उसके पैक परिप्रेक्ष्य में वहां के लोगों ने भारतीय धर्म में दीक्षा ली तथा अनेक भारतीय रीति-रिवाजों शिक्षाओं को का तिब्बत में प्रादुर्भाव हुआ। रिश्तान गाम्पू जो तिब्बत का शासक था, भी बौद्ध धर्म पार्शियन तय के प्रभाव मण्डल से आलोकित हो गया तथा अपने राज्य में नये धर्म का प्रचलन प्रारम्भ गाढ़ हुआ तया किया। गाम्पू ने भारतीय वर्णमाला को अंगीकार किया तथा तिब्बती व्याकरण का प्रारम्भ तथा चीन को किया। तिब्बत ने उस काल में जो लिपि अपनायी वह भी तत्कालीन भारतीय लिपि से के स्थान कर साम्य रखती थी। भारतीय ग्रंथों के सार को दो पुस्तकों में समाहित किया गया, जिनके नाम हैं तान जुर तथा कान जुर इन दोनों ग्रन्थों में वे तमाम ज्ञान कोष उपलब्ध हैं जो नालन्दा, तक्षशिला व विक्रमशिला विश्वविद्यापीठों व अन्य शिक्षा के केन्द्रों को नष्ट कर दिए जाने के कारण विलुप्त हो गये थे।

चीन, कोरिया तथा जापान (Chian, Korea and Japan)- काफी बड़ी संख्या में भारतीय विद्वानों व भिक्षुओं ने चीन देश की यात्रा की। चीन जाने वाले कुछ महत्वपूर्ण प्रचारक थे-कुमार जीव, गुण वर्मन, बोधि धर्म, पमार्थ, जिंगुप्ता आदि। ये विद्वान् शीघ्र बम भी सम्मिति ही चीन के मानस पटल पर छा गये। छठी शताब्दी ई सन् में बौद्ध धर्म चीन के रास्ते अफगानिस्तान होता हुआ कोरिया तथा जापान तक जा पहुंचा। बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार के साथ हुआ करते ही भारतीय सभ्यता व संस्कृति का प्रभाव भी इन दशों के जीवन पर प्रकट होने लगा।

वर्मा/म्यान्मार – भारतीय वर्मी संबंध पुरातन काल से सांस्कृतिक आदान-प्रदान की परंपराओं पर आधारित रहे हैं। ये बौद्ध धर्म और बर्मी लिपि को शामिल करते थे, जो भारतीय ग्रंथ लिपि पर आधारित थी। थेरवाद बौद्ध धर्म ने बर्मी समाज और संस्कृति को अत्यधिक प्रभावित किया है।

मंगोलिया (Mangolia)- चीन, जापान व कोरिया में अपने पैर जमाने के पश्चात सक्के तथा बौद्ध धर्म ने मंगोलिया राष्ट्र की धरती पर भी दस्तक दे दी। अगली कुछ शताब्दियों में क्षेत्रों में अपि सपूर्ण मंगोलिया में आदिवासी धर्मों के साथ ही बौद्ध धर्म की पताका फहराने लगी।

मलेशिया-

भारत के हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म प्रारंभिक क्षेत्रीय इतिहास पर प्रभावी थे, जिसे बाद में 16वीं शताब्दी में यूरोपीय उपनिवेशवाद शुरू होने से पहले 14वीं और 15वीं शताब्दी ई. में धीरे-धीरे इस्लाम द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था।

जापान-

  • बोधिसेन, मदुरै के एक भिक्षु 8वीं शताब्दी ईस्वी में जापान में संस्कृत पढ़ाने वाले, जापान में केगॉन स्कूल की स्थापना करने वाले पहले भारतीय थे।
  • हीओ हह्वांग-ओके एक प्रसिद्ध रानी थी, जिसका उल्लेख 13वीं शताब्दी ईस्वी के कोरियाई इतिवृत्त समगुक युसा में किया गया है। दक्षिण भारत में स्थित माने जाने वाले सुदूर के राज्य से नाव से आने के बाद वह 16 साल की उम्र में ग्यूमगवान गया के राजा सुरो की पत्नी बन गयीं। अयोध्या में उनका स्मारक है।

कोरिया-

  • बौद्ध धर्म चीन के रास्ते कोरिया पहुँचा। सुंडो पहले बौद्ध भिक्षु थे, जिन्होंने 352 ईस्वी में बुद्ध की छवि और सूत्र लेकर कोरिया में प्रवेश किया और उसके बाद आचार्य मल्लानंद ने 384 ईस्वी में प्रवेश किया।

वियतनाम-

  • भारत और वियतनाम के बीच सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध दूसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व के हैं, जिसमें पत्थर के मंदिरों में संस्कृत और चाम दोनों शिलालेख पाये जाते हैं। इन मंदिरों में पाये गये शिवलिंगों से चाम लोगों ने शिव की पूजा की।
  • वियतनाम दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में “संस्कृत नगर-राज्य” का हिस्सा था।

 

इंडोनेशिया-

  • रामायण में यवद्वीप (जावा) का उल्लेख है। राम की सेना के प्रमुख सुग्रीव ने सीता की तलाश में अपने लोगों को यवद्वीप भेजा।
  • रामायण इंडोनेशियाई नृत्य नाटक परंपराओं, विशेष रूप से जावा और बाली में एक प्रमुख विषय है। उनका संगीत भी भारतीय संगीत से प्रभावित है।

भारतीय संस्कृति का पश्चिम पर प्रभाव –

भारत और मॉरीशस के बीच संबंध 1730 ईस्वी से अस्तित्व में थे, जब पुड्डुचेरी और तमिलनाडु से कारीगरों को लाया गया था।

मॉरीशस-

1820 के दशक से भारतीय श्रमिक गन्ने के बागानों में काम करने के लिए मॉरीशस जाने लगे। 1834 से जब ब्रिटिश संसद द्वारा गुलामी को समाप्त कर दिया गया, तो बड़ी संख्या में भारतीय श्रमिकों को गिरमिटिया मज़दूरों के रूप में मॉरीशस लाया जाने लगा।

भारत -अफ्रीका संबंध अफ्रीकी संबंध सिंधु घाटी सभ्यता के कांस्य युग की अवधि के हैं. इसी अवधि के दौरान पहली बार अफ्रीका में बाजरे की खेती किये जाने के प्रमाण चन्हुवड़ो नामक स्थान पर पाये गये हैं और उसी स्थान पर अफ्रीकी महिलाओं को दफन करने का कम से कम एक प्रमाण भी है। ये ऐतिहासिक संबंध मुख्य रूप से भारत और पूर्वी अफ्रीका से संबंधित हैं।

सिंधु- मेसोपोटामिया का बहुत मज़बूत व्यापारिक संबंध था, जो मेसोपोटामिया में कारेलियन मोतियों और सिंधु मुहरों की खोज से प्रमाणित होता है।

अरब और इराक़ – प्राचीन एलाम (दक्षिणी फारस) भी सिंधु तथा मेसोपोटामिया के बीच होने वाले समुद्री व्यापार से लाभान्वित होता था, क्योंकि यह इन दोनों के बीच में स्थित है।

फारस-

550-539 ईसा पूर्व के बीच साइरस के नेतृत्व में सिंधु घाटी क्षेत्र पर अचमेनिद द्वारा प्राप्त की गयी विजय दोनों क्षेत्रों के बीच व्यापारिक और कलापरक संबंध स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण थी। यह सिकंदर द्वारा विजय करने पर ये संबंध समाप्त हुए और इससे भारतीय कला और

वास्तुकला पर ग्रीक प्रभाव आया। 12वीं शताब्दी में इस्लामी सरदारों के आगमन के बाद, फारसी और बीजान्टिन वास्तुकला, भाषा, भोजन और फैशन ने भारतीय संस्कृति पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डाला। भारतीय लघु चित्रकला के साथ-साथ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत फारसी प्रभाव से विकसित हुआ।

अफगानिस्तान और भारत के लोगों के बीच संबंध सिंधु घाटी सभ्यता के समय से बने हुए हैं और मौर्य साम्राज्य के माध्यम से इनमें निरंतरता बनी रही।

अफ़ग़ानिस्तान-

बामियान के बोधिसत्वों को कुषाण सम्राट कनिष्क द्वारा तराशा गया था। इन्हें तालिबान ने नष्ट कर दिया।

भारतीय विश्वविद्यालयों और विद्वानों की भूमिका :

भारतीय विश्वविद्यालय सांस्कृतिक क्रिया के सबसे महत्त्वपूर्ण केंद्र थे।

  1. तकशिला विश्वविद्यालय – विश्व के पहले विश्वविद्यालय तक्षशिला की स्थापना लगभग 900/800 ईसा पूर्व में हुई थी। विश्व भर के 10,500 से अधिक छात्रों ने 60 से अधिक विषयों का यहाँ अध्ययन किया और इस प्रकार, भारतीय विश्वविद्यालयों के प्रभाव का प्रसार विदेश में हुआ।
  2. नालंदा विश्वविद्यालय – 5वीं शताब्दी ईस्वी में स्थापित नालंदा महाविहार, शिक्षा के क्षेत्र में भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक था। हवेन त्सांग, एक चीनी बौद्ध यात्री, ने नालंदा में शीलभद्र के मार्गदर्शन में दो साल तक अध्ययन किया। उन्हें यहाँ एक भारतीय नाम मोक्षदेव दिया गया था। एक चीनी बौद्ध यात्री आई-त्सिंग, 10 वर्ष तक नालंदा में रहा। 8वीं शताब्दी में तिब्वत में बौद्ध धर्म के प्रचार का नेतृत्व करने वाले शान्तरक्षित नालंदा के एक विद्वान थे। नालंदा महाविहार से सम्बंधित अन्य विद्वानों में आर्यभट्ट, अतिश, दिग्नाग, धर्मपाल और नागार्जुन आदि थे।
  3. विक्रमशिला विश्वविद्यालय- विक्रमशिला एक अन्य विश्वविद्यालय था, जो गंगा के दाहिने तट पर स्थित था। इस विश्वविद्यालय के शिक्षक और विद्वान इतने प्रसिद्ध थे कि बताया जाता है कि तिब्बती राजा ने आम संस्कृति में रुचि तथा स्वदेशी ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए एक शिष्टमंडल को विश्वविद्यालय के प्रमुख को आमंत्रित करने के लिए भेजा।
  4. ओदन्तपुरी विश्वविद्यालय – एक अन्य विश्वविद्यालय ओदंतपुरी भी बिहार में था। यह पाल राजाओं के संरक्षण में उभरा। इस विश्वविद्यालय से कई भिक्षु जाकर तिब्बत में बस गये।
  • 67 ईस्वी में चीनी सम्राट के निमंत्रण पर दो भारतीय शिक्षक चीन गये थे। उनके नाम कश्यप मार्तगा और धर्मरक्षित थे। इनके पश्चात् इन भारतीय विश्वविद्यालयों के बहुत-से शिक्षक शिक्षण के लिए विदेश गये।
  • विद्वान बोधिधर्म, जो योग के दर्शन के गुरू माने जाते हैं, आज भी चीन और जापान में पूजनीय हैं। बोधिधर्म इतने प्रख्यात व्यक्ति बन गये कि लोग चीन और जापान में उनकी पूजा करने लगे।
  • भारतीय ऋषियों ने इस शक्तिशाली योग विज्ञान का विश्व के विभिन्न हिस्सों में प्रसार किया, जिसमें एशिया, मध्यपूर्व, उत्तरी अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका सम्मिलित हैं।
  • सप्तऋर्षि अगस्त्य, जिन्होंने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की यात्रा की, इस संस्कृति को जीवन के मूल योगिक तरीके से तैयार किया।
  • नालंदा विश्वविद्यालय के आचार्य कमलशील को तिब्बत के राजा से आमंत्रण मिला। माना जाता है कि तिब्बती राजा नरदेव ने अपने मंत्री थोन्मी सम्भोट को सोलह उत्कृष्ट विद्वानों के साथ मगध भेजा, जहाँ उन्होंने भारतीय शिक्षकों के मार्गदर्शन में शिक्षा ग्रहण की थी।
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