मौर्यकालीन/कौटिल्य कालीन भारत में राजदूत व्यवस्था

आचार्य कौटिलय

शोध सारांश

     प्राचीन भारत के प्रायः सभी राजशास्त्रियों ने राजदूत की आवश्यकता एवं उपयोगिता को स्वीकार किया है। तत्कालीन समय में राज्य के सुसंचालन हेतु महत्वपूर्ण पद राजदूत के सहयोग की आवश्यकता स्वीकार की गई है। ये राज्य कर्मचारी, राज्य संचालन में उपयोगी और आवश्यक बतलाये गये हैं। लगभग सभी राजशास्त्र प्रणेताओं ने राजा के कर्तव्य पालन के लिए राजदूत की उपयोगिता प्रमाणित की है। आचार्य कौटिल्य ने इन्हें राजा का मुख बतलाया है। प्रस्तुत शोध पत्र में कौटिल्य कालीन भारत की राजदूत व्यवस्था तथा राष्ट्र के प्रति उनके कर्तव्यों पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है।

शब्द कुंजी –  राजदूत,निःसृष्टार्थ, परिमितार्थ, शासनहार, अवध्य आदि।

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प्रस्तावना

     कौटिल्य अर्थशास्त्र  की शासन व्यवस्था में राजदूत का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। राजदूत को सदैव राजसिंहासन के समीप स्थान दिया जाता था। उसकी बात को ध्यानपूर्वक सुनकर उसका उपयुक्त उत्तर देकर उसे विदा किया जाता था। अन्य आचार्यों की तरह कौटिल्य की राज्य व्यवस्था में भी राजदूत अवध्य माने जाते थे। यह नियम दूत कर्म सम्पन्न करने के लिए नितान्त आवश्यक था, क्योंकि राजदूत द्वारा दिया जाने वाला संदेश प्रिय और अप्रिय दोनों प्रकार के हो सकते थे। अप्रिय संदेश अत्यंत कटु और असहनीय हो सकते थे। किन्तु राजदूत जो कुछ भी कहता था वह अपने राजा का दिया हुआ संदेश होता था, अतः उसमें राजदूत का कोई दोष नहीं माना जाता था। इसलिए कौटिल्य ने राजदूत की सुरक्षा परमावश्यक मानी है। इस प्रकार अर्थशास्त्र में राजदूत बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

शोध का उद्देश्य – 

  1. कौटिल्य कालीन भारत में राजदूत व्यवस्था का अध्ययन करना।
  2. कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र में वर्णित राजदूतों के कर्तव्यों का अध्ययन करना।

शोध परिकल्पना –

     कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र में राजदूत व्यवस्था का विस्तृत वर्णन किया गया है। तत्कालीन मौर्य साम्राज्य के विस्तार, विकास एवं परराष्ट्र नीति के निर्वहन में राजदूत व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका थी.

शोध प्रविधि –

     प्रस्तुत शोध पत्र को तैयार करने में ऐतिहासिक अनुसंधान विधि के अंतर्गत विद्वान मनीषियों द्वारा लिखित पुस्तक, शोध पत्र, आलेख आदि की सहायता ली गई है।   

राजदूत व्यवस्था-

     साधारण शब्दों में ले जाने वाले को दूत कहा जाता है। जिस व्यक्ति को एक राजा या राज्य द्वारा दूसरे राजा के पास कोई संदेश पहुंचाने के लिए नियुक्त किया जाता है, उसे राजदूत की संज्ञा दी जाती है। कौटिल्य के अनुसार राजदूत को राजा का मुख माना गया है क्योंकि दूत रुपी मुख द्वारा ही राजा एक-दूसरे से बातचीत करते हैं।1 राजा के सो जाने पर भी ये दोनों इन्द्रियां निरन्तर कार्य करती रहती हैं।2 डा. चक्रवर्ती ने वार इन एन्सियंट इण्डिया में लिखा है कि प्राचीन भारत में राजदूत कुछ परम्परागत नियमों से सुरक्षित एक सम्मानित चर मात्र ही होता था।3 

राजदूत के प्रमुख गुण

    आचार्य कौटिल्य ने राजदूत के गुण अमात्य के समान बताए हैं। उनके अनुसार राजदूत को हृदय का पवित्र, चतुर, कूटनीतिज्ञ, साहसी, निर्भीक, बुद्धिमान, नीतिशास्त्र में निपुण आदि गुणों से परिपूर्ण होना चाहिए।4 कौटिल्य ने एक श्रेष्ठ राजदूत में निम्नलिखित लक्षणों को आवश्यक बताया है5-

1.    राजदूत प्राणों की बाजी लगाकर भी यथार्थ कहे।

2.    शत्रु द्वारा प्राप्त सम्मान पर गर्व न करे।

3.    शत्रु के बीच स्वयं को बलवान न समझे।

4.    शत्रु के कटु वचन को भी चुपचाप सहन कर ले।

5.    स्त्री प्रसंग और मद्यपान से दूर रहे।

6.    अपने स्थान में एकाकी शयन करे।

आचार्य कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में तीन प्रकार के राजदूतों का उल्लेख किया है6-

1.    निःसृष्टार्थ   2. परिमितार्थ  3. शासनहार

निःसृष्टार्थ-

     ऐसा दूत जिसमें अमात्य के सभी गुण विद्यमान हों और जो अमात्य की स्थिति रखता हो। इसे विदेशी राजा से सन्धि आदि करने के पूर्ण अधिकार प्राप्त थे, वह अविरल रुप से अपनी सरकार का प्रतिनिधित्व करता था। कौटिल्य के शब्दों में निःसृष्टार्थ राजदूत पूर्ण अधिकार सम्पन्न होते हैं। ये राजा की ओर से निर्णय भी ले सकते हैं। राजा अपना पूर्ण उत्तरदायित्व उन पर छोड़ देता है। अमात्य के गुणों से युक्त निःसृष्टार्थ राजदूत होता है।

परिमितार्थ-

     आचार्य कौटिल्य के शब्दों में- अमात्य के चतुर्थांश गुण रहित दूत परिमितार्थ होता है।7 निःसृष्टार्थ दूत की तुलना में इनकी स्थिति हीन मानी जाती है। परिमितार्थ दूत को किसी निश्चित मामले में समझौता करने का अधिकार होता था और वह केवल वही समझौता कर सकता था, जिसका उसे अधिकार दिया गया हो। इस प्रकार ये परिमित अर्थात सीमित उत्तराधिकार का निर्वाह करते थे।

शासनहर-

     आचार्य कौटिल्य के अनुसार- अमात्य के आधे गुणों से हीन दूत शासनहर होता है।8 इसकी स्थिति हीन मानी जाती है। यह केवल राजकीय संदेश को पहुंचाने का ही कार्य करता है। स्वयं कोई सन्धि या समझौता करने का अधिकार नही होता था। अमात्य के लिए जो गुण आवश्यक थे, उसके आधे गुण ही शासनहर दूत के लिए पर्याप्त समझे जाते थे।

राजदूत के कर्तव्य –

     राजदूत का प्रमुख कर्तव्य शान्तिपूर्ण साधनों द्वारा राष्ट्रहित की अभिवृद्धि करना है। यदि किसी राज्य को अपने हितों के लिए युद्ध करना पड़े तो यह उसके राजदूत की असफलता मानी जायेगी। आचार्य कौटिल्य के मतानुसार राजदूत आदर्शों का लक्ष्य मानकर नहीं चलता वरन् राज्य के लिए वास्तविक सफलता प्राप्त करना ही उसका लक्ष्य होता है। नीति की सफलता को उससे प्राप्त होने वाले फल की कसौटी पर रखकर परखना चाहिए।9

आचार्य कौटिल्य ने राजदूत के प्रमुख कर्तव्यों का उल्लेख इस प्रकार किया है10-

1.    राष्ट्रीय हितों की रक्षा- राजदूत का मुख्य लक्ष्य अपने राज्य के हितों की रक्षा करना है। प्रत्येक राज्य का मूलभूत हित अपनी सीमाओं की रक्षा करना है। इसके अतिरिक्त आर्थिक हित, व्यापार आदि भी महत्वपूर्ण हैं। राजनय इनकी सुरक्षा का प्रयास करता है।

2.    राज्य की प्रादेशिक, राजनीतिक एवं आर्थिक अखण्डता की रक्षा- राजनय का प्रमुख कार्य है कि वह अपने देश  की प्रादेशिक अखण्डता के साथ-साथ राजनीतिक एवं आर्थिक अखण्डता की भी रक्षा करे। केवल सैनिक आक्रमण से ही अपने राज्य की सुरक्षा खतरे में नहीं पड़ जाती वरन् रण कौशल के महत्व के क्षेत्रों पर नियन्त्रण करके आर्थिक दबाव एवं देश में राजनीतिक प्रभाव बढ़ाकर भी उसकी सुरक्षा को खतरे में डाला जा सकता है। इसलिए राजनय को हमेशा सजग रहना चाहिए तथा देश की रक्षा के विरुद्ध दूसरे राज्यों की नीति पर रोक लगानी चाहिए।

3.    मित्रों से सम्बन्ध बनाना तथा शत्रुओं से तटस्थ रहना- राजनय राष्ट्रीय हितों की उपलब्धि के लिए मित्र देशों  के साथ अपनी मैत्री सन्धि को दृढ़ बनाता है। वह सन्धि वार्ता द्वारा अपने समर्थको एवं मित्रों की संख्या में वृद्धि करता है। सामान्य हितों वाले राज्यों के साथ उसके मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध दृढ़ हो जाते हैं। एक सम्भावित शत्रु का भय विभिन्न राज्यों के बीच मित्रता का बीज बोता है, किन्तु उसके पनपने के लिए राजदूत के द्वारा सक्रिय प्रयास किया जाता है। जिन राज्यों के राष्ट्रहित परस्पर भिन्न अथवा विरोधी हैं उनके बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों की कम सम्भावना है। अतः राजनय का लक्ष्य ऐसी शक्तियों को तटस्थ बनाना होता है, ताकि वे उसके राष्ट्रीय हितों को हानि न पहुंचा सकें।

4.    विरोधी शक्तियों के गठबंधन को रोकना- राजदूत का लक्ष्य है कि वह अन्य राज्यों को अपने राज्य के विरुद्ध, संगठित होने से रोके। इसके लिए उसे कुछ राज्यों के साथ समझौता करना होगा। कुछ को समर्थन देना होगा तथा कुछ ऐसे राज्यों से समर्थन एवं सहायता रोकनी होगी जो इसका प्रयोग स्वयं दाता राज्य के राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध करते हों, यदि ये सारे तरीके असफल हो जायें और शक्ति का प्रयोग करना अनिवार्य बन जाये तो यह सर्वाधिक लाभप्रद परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए और इस रुप में किया जाना चाहिए ताकि दुनिया के सारे राज्य यह जान जायें कि यह राज्य न्याय के पक्ष में है तथा केवल अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ रहा है।

5.    युद्ध में भूमिका- युद्ध बुरा होते हुए भी अपरिहार्य है। सभ्यता के प्रारम्भ से इसे रोकने के प्रयास होते रहें हैं युद्ध की नीति प्रायः वही देश अपनाता है, जिसे इसकी सफलता का भरोसा हो, कमजोर तथा सैनिक प्रधानहीन राज्य युद्ध का जोखिम नहीं उठाते, वे अपने मित्रों की संख्या बढ़ाते हैं और राजनयिक तरीके से अपने अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर लेते हैं। यदि युद्ध छेड़ना आवश्यक बन जाये तथा सन्धिवार्ता के सभी साधन असफल हो जायें जो राजदूत के दायित्व का रुप बदल जाता है। युद्धकाल में भी प्रभावशाली राजदूत का महत्व है। प्रभावशाली राजनय के अभाव में न तो युद्ध लड़े जा सकते हैं और न जीते जा सकते हैं। युद्ध से पूर्व गलत राजनयिक तैयारियां एवं युद्धकाल में प्रभावहीन राजदूत एक शक्ति सम्पन्न राष्ट्र की हार एवं विनाश का कारण बन जाती है।

6.    राज्य के स्थाई हितों की पूर्ति- राजनय का मुख्य लक्ष्य राज्य के स्थाई हितों की पूर्ति करना है। इन स्थाई हितों की अवहेलना केवल भयानक संकट के समय ही हो सकती है। कभी-कभी अस्थाई लाभों के साथ भी इनकी सौदेबाजी की जाती है। जनता के आग्रह एवं दबाव के कारण सरकार को कुछ समय के लिए स्थाई हितों को छोड़कर अन्य हितों को प्राप्त करने का प्रयास करना पड़ता है। यह राजनय की दृष्टि से अत्यन्त खतरनाक है। भावनाओं पर आधारित जन प्रतिक्रिया के दबाव में राज्य को यदि अपनी विदेशनीति या राजनय को बदलना पड़े तो यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है।

     कौटिल्य अर्थशास्त्र में यत्र-तत्र प्राप्त संकेतो से राजदूत के अधिकारों एवं कर्तव्य का ज्ञान होता है। आचार्य कौटिल्य का मत है कि किसी देश में राजदूत की नियुक्ति के समय उसे ठाट-बाट के साथ भेजना चाहिए। राजदूत को भी स्वामी के प्रति पूर्ण कर्तव्य निष्ठा के साथ जाना चाहिए। कौटिल्य के अनुसार राजदूत को निम्नलिखित कार्यों का सम्पादन अपनी पूरी क्षमता के साथ करना चाहिए।11

1.  शत्रु प्रदेश में अपने स्वामी का संदेश लेकर जाना।

2.  शत्रु राजा का संदेष लाने के लिए जाना।

3.  सन्धि भाव को बनाये रखना।

4.  समय आने पर पराक्रम दिखाना।

5.  अधिक से अधिक मित्र बनाना।

6.  शत्रु प़क्ष के लोगों को तोड़ना।

7.  शत्रु के मित्र को उससे अलग करना।

8.  अपने गुप्तचरों और सेना को भगा देना।

9.  शत्रु के बान्धवों और रत्नों का अपहरण कर लेना।

10. शत्रु देश में रहकर गुप्तचरों के कार्यों का निरीक्षण करना।

11. सन्धि की जमानत के रुप में बन्धक राज कुमार को मुक्त करना।

12. मारक, मोहन, उच्चाटन आदि का प्रयोग करना।

     आचार्य कौटिल्य ने अन्य स्थानों पर कहा है कि राजदूत को मुख्यतः उन राजकीय अधिकारियों से मित्रता बढ़ानी चाहिए, जिनके अधिकार में जंगल, सीमावर्ती क्षेत्र आदि विषय हैं।12

    उनके अनुसार राजदूतों को शत्रु राज्य की किलेबन्दी का पूरा ज्ञान होना चाहिए। उसे मूल्यवान खजाना का भी पता लगाना चाहिए। इसके अतिरिक्त स्कन्धवार और युद्ध प्रतिगृह के विषय में जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।13

     विदेशी राज्यों के दुर्गों और राष्ट्र का कितना आकार-प्रकार है तथा उसके कौन-कौन से स्थल सशक्त हैं और कौन-कौन से निर्बल एवं कौन से सुगुप्त रुप हैं, इन सबकी जानकारी राजदूत को होनी चाहिए।14

     राजदूत को शत्रु राज्य के तीर्थ स्थानों, देवालयों, चित्रों और लिपि संकेतों द्वारा वहीं के वृतान्तों को जानना चाहिए।15

     कौटिल्य ने राजदूत को अवध्य माना है। उनके अनुसार राजदूत को बन्दी बनाया जा सकता है परन्तु उनकी हत्या कदापि नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा है कि कोई चाण्डाल भी राजदूत के पद पर नियुक्त किया गया हो तो राजधर्म के अनुसार वह भी अवध्य है।16

निष्कर्ष-

      प्राचीन भारत के प्रायः समस्त राजनीतिज्ञों एवं विद्वानों ने राजदूत की आवश्यकता एवं उपयोगिता को स्वीकार किया है। तत्कालीन समय में राज्य व परराष्ट्र नीति के सफल संचालन हेतु राजदूतों की नियुक्ति के विषय में लगभग सभी राजशास्त्र प्रणेताओं ने राजा के कर्तव्य पालन के लिए राजदूत की उपयोगिता प्रमाणित की है। आचार्य कौटिल्य ने राजदूत को राजा का मुख बतलाया है। क्योंकि दूत रुपी मुख द्वारा ही राजा एक-दूसरे से बातचीत करते हैं। राजा के सो जाने पर भी ये तीसरी नेत्र की भांति निरन्तर कार्य करती रहती हैं। मौर्यकाल में राजनय के सिद्धान्त और व्यवहार अपने चरम स्तर पर पहुंच गई थी। उस काल में सैल्यूकस निकोटार ने मैगस्थनीज को राजदूत बनाकर चन्द्रगुप्त के दरबार में भेजा था। सम्राट अशोक का लंका, सीरिया, मिश्र, मेकेडन आदि देशों के साथ राजनयिक सम्बन्ध था। कौटिल्य के अनुसार अपने देश में राजा, राज्य के कार्य और नीति नियम निर्धारित करता है, विदेश में राज्य के यही कार्य राजदूत करता है। राजदूत वैदेशिक सम्बन्धों में राजा का प्रतिनिधित्व करता है।

वर्तमान में भारत के राष्ट्रपति विदेशों में राजदूत नियुक्त करने के लिए उत्तरदायी है। प्रधानमंत्री के द्वारा परराष्ट्र में राजदूतों की नियुक्ति की सूची राष्ट्रपति को दिया जाता है।

संदर्भ संची-

1.    मेजर श्याम लाल- सैन्य विज्ञान भाग-1, पृ0 83

2.    कामन्दकीय नीतिसार, 30/12

3.    सिंह, रघुनाथ- कौटिलीयम् अर्थशास्त्रम, 1/16

4.    प्रसाद, चन्द्रदेव- कौटिल्य, पृ0 160

5.    कौटिल्य अर्थषास्त्र, 7/1

6.    प्रसाद, चन्द्रदेव- कौटिल्य, पृ0 160-161

7.    कौटिलीयम् अर्थशास्त्रम्, 1/15

8.    वही

9.    वही

10.   अग्रवाल, श्रीमति कमलेश -कौटिल्य अर्थशास्त्र एवं शुक्रनीति की राज्य व्यवस्थाऐं, पृ0 168

11.   शर्मा, हरिचन्द्र- राजनय के सिद्धान्त, पृ0 19-20

12.   कौटिल्य अर्थशास्त्र, 1/15 व शर्मा, हरिचन्द्र-राजनय के सिद्धान्त, पृ0 162

13.   कौटिल्यम् अर्थशास्त्रम्, 1/15

14.   वही

15.   वही

16.   जैन, जय कुमार- कौटिल्य अर्थशास्त्र, पृ0 112

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